ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई गायब, सत्ता संघर्ष हुआ तेज

नई दिल्ली
ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई इस समय ईरान में नहीं हैं, सऊदी समाचार चैनल अल-हदथ ने एक इजरायली सुरक्षा सूत्र के हवाले से यह दावा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, उनके नाम से जारी होने वाले संदेश सीधे उनकी ओर से नहीं, बल्कि इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के नए प्रमुख अहमद वहीदी तैयार कर रहे हैं। हालांकि, इस दावे की ईरान की ओर से कोई पुष्टि नहीं की गई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ईरान के भीतर गहरे राजनीतिक मतभेद पैदा हो गए हैं, जो IRGC की एकता और देश की सत्ता व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकते हैं।

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इजरायली सूत्र ने दावा किया कि अमेरिका नहीं चाहता कि अगर ईरान हमला भी करे, तब भी इजरायल जवाबी कार्रवाई में सीधे शामिल हो। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान में अमेरिका के साथ हुए 14 सूत्रीय समझौते के बाद सत्ता के भीतर संघर्ष और तेज हो गया है। कट्टरपंथी धड़े सरकार पर तख्तापलट करने का आरोप लगा रहे हैं। उनका कहना है कि समझौता करके सरकार ने देश के हितों और मौजूदा सर्वोच्च नेता के निर्देशों की अनदेखी की है। इसे लेकर असंतोष बढ़ता जा रहा है।

खामेनेई के अंतिम संस्कार के दौरान नाराजगी आई सामने
ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार के दौरान भी यह नाराजगी खुलकर सामने आई। विदेश मंत्री अब्बास अराघची पर पथराव किया गया, जिन्होंने अमेरिका के साथ युद्धविराम वार्ता में अहम भूमिका निभाई थी। प्रदर्शनकारियों ने उन्हें डील करने वाला और देश से गद्दारी करने वाला बताते हुए नारे लगाए। रिपोर्ट में कहा गया कि मोजतबा खामेनेई लंबे समय से सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं। ऐसे में संसद के पूर्व अध्यक्ष और मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाघेर गालीबाफ, राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और विदेश मंत्री अब्बास अराघची युद्ध के बाद देश के प्रमुख फैसले लेते दिखाई दे रहे हैं।

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मोजतबा खामेनेई की लगातार गैरमौजूदगी से परेशानी
अमेरिकी रिसर्चर अराश अजीजी के अनुसार, मोजतबा खामेनेई की लगातार गैरमौजूदगी के कारण यही नेता सरकार का संचालन कर रहे हैं, जिससे कट्टरपंथी गुट खुद को सत्ता से अलग-थलग महसूस कर रहा है। इसी वजह से वे गालीबाफ और पेजेशकियन पर सत्ता पर कब्जा करने की साजिश रचने का आरोप लगा रहे हैं। कट्टरपंथी सांसद महमूद नबावियान और कमरान गजनफारी जैसे नेताओं ने भी सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि सरकार सर्वोच्च नेता और संसद की भूमिका कम करके राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद को अधिक शक्तियां देना चाहती है। उन्होंने कहा कि यह एक सुनियोजित राजनीतिक बदलाव है।

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